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वरिष्ठ पत्रकार रजनीश के शर्मा के पिताजी, वार हीरो- उत्तराखंड रत्न, 1962, 1965 व 1971 (वार वाउंडेड व प्रिजनर ऑफ वार) और नेशनल फुटबॉल प्लेयरों में शुमार स्वर्गीय दुर्गा प्रसाद जी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि एवं कोटि कोटि प्रणाम

वरिष्ठ पत्रकार रजनीश के शर्मा के पिताजी, वार हीरो- उत्तराखंड रत्न, 1962, 1965 व 1971 (वार वाउंडेड व प्रिजनर ऑफ वार) और नेशनल फुटबॉल प्लेयरों में शुमार स्वर्गीय दुर्गा प्रसाद जी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि एवं कोटि कोटि प्रणाम

आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि 2023 में यानी अंग्रेजी कैलेंडर अनुसार 09 जुलाई 2023 को परम श्रद्धेय मेरे पिताश्री ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। लेकिन एक पल के लिए भी उनकी विस्मृति नहीं हो पाई। उनका साया, उनके आशीर्वाद के साथ हमेशा उनका सपोर्ट, घर परिवार, आदर्श व संस्कार ओर छोटे बड़ों का आदर सम्मान एवं लिहाज, उनके रहने तक ही था, जो विरासत अब धीरे धीरे उनकी तरह ही धूमिल कहे या कहें कि विलुप्त होती जा रही है।

मेरे पिताजी दुर्गा अष्टमी के दिन अक्टूबर माह 1936 में गढ़ी कैंट, देहरादून में ही ब्राह्मण परिवार के वशिष्ठ गोत्र में जन्म लेने के दुर्गा नाम पड़ा, स्वर्गीय श्री दुर्गा प्रसाद 3 भाई ओर एक बहन थे और वे घर में सबसे छोटे थे। उनके सबसे बड़े भाई भी गढ़ी कैंट देहरादून में ही 1905 में जन्मे थे उन्होंने अनेकों कठिनाइयों को झेलते हुए उस जमाने में कैंट बॉयज स्कूल, गोरखा मिलिट्री इंटर कॉलेज ओर फिर डी ए वी इंटर कॉलेज पढ़ाई की और अपने जीवन की सभी बुलंदियों को छुते हुए शून्य से शिखर तक सफर किया।

बचपन से ही वो स्वतंत्रता सेनानी गोरे खान जी के संपर्क में आकर आजाद हिंद फौज से जुड़ गए, फिर बहुमुखी प्रतिभा के धनी, मिलनसार, संघर्षशील ओर सबके सुखदुःख में साथ खड़े होकर सामाजिक कर्तव्य निभाया। रामलीला कमेटी गढ़ी कैंट से जुड़कर उन्होंने कई किरदार निभाये किंतु, तुलसीदास ओर भरत का किरदार जबतक रामलीला कमेटी बंद नहीं हो गई 1990 के दशक तक लगातार निभाते रहे, ओर मरते दम तक रामलीला में राम, लक्ष्मण, भरत, हनुमान, तुलसीदास और लव कुश के किरदार व उनके डायलॉग उन्हें कंठस्थ था। रामलीला का जुनून ऐसा कि हर साल फौज से छुट्टी उसी वक्त आते थे जब गढ़ी कैंट रामलीला कमेटी का कार्यक्रम होता था।

अपने पिताजी से काफी नजदीक रहते हुए समाज की दुनियादारी सहित हर क्षेत्र में बहुत कुछ सीखने को मिला, जो वो कर गए इस दुनिया में वो सब हम कुछ भी नहीं कर पाए। हमने उनके मुंह के करीब भी कभी गाली गलौच, भद्दी टिप्पणियां, शराब या अन्य किसी भी प्रकार के नशे का सेवन करते नहीं देखा।
बस नशा था उनको दोस्ती ओर सबकी मदद को तत्परता का, रामलीला में पाठ/ किरदार निभाने का, भक्ति भाव से वो सदैव ओत प्रोत रहे, बहुत बढ़िया भजन भी गाते रहे। एक सैनिक होने के नाते देशभक्ति का जज्बा उनमें कूट कूट कर भरा था।

एक और नशा किया हमारे पिताजी ने, वो था खेल का, फुटबॉल के प्रति प्रेम उनके जिंदगी का टर्निंग पॉइंट बना। रामलीला, फुटबॉल ओर भारतीय सेना के प्रति उनका प्यार मरते दम तक कम न हो पाया। महेंद्र ग्राउंड में फुटबॉल खेलते हुए दो गोल मारने वाले ओर बेहतरीन प्रदर्शन से प्रभावित हो कर, किसी ने उन्हे कंधे में उठा लिया ओर भारतीय सेना में भर्ती के लिए ले गए। हालांकि उस दौर में 1956 के समय ब्राह्मणों को भारतीय सेना सिर्फ पंडिताई/ पुजारी या फिर किचेन के लिए भर्ती किया जाता था किंतु उनके प्रभावी खेल के कारण उन्हें राजपूत यानि ठाकुर बनवा दिया गया। फिर वो भारतीय सेना के लगभग सभी ब्रिगेड और ईस्टर्न कमांड, वेस्टर्न कमांड, सेंट्रल कमांड में सेंटर फॉरवर्ड ओर राइट आउट पोजीशन पर 10 no की जर्सी पहन कर खेलते रहे। पिताश्री ने डूरंड कप, रोवर्स कप, संतोष ट्राफी जैसे कई राष्ट्रीय फुटबॉल प्रतियोगिता खेली व विजेता टीम का प्रमुख हिस्सा रहे। इन टूर्नामेंट में गोल करते हुए तस्वीर उस दौर के प्रतिष्ठित समाचार पत्र में प्रकाशित हुई। पिताश्री विजय कैंट टीम के फाउंडर मेंबर भी रहे ओर 80 के दशक में मोहमडन स्पोर्टिंग क्लब के कोच भी रहे। उनके साथ के जाने माने फुटबॉल प्लेयरों में, मोहन बगान टीम के श्याम थापा, डी सी एम ग्रुप से डीबी क्षेत्री, अमर बहादुर गुरुंग आदि रहे ।

फुटबॉल में हमें भी स्टेट खेलने का मौका मिला, गोरखपुर, इलाहाबाद, शांति निकेतन बोलपुर, में कई टूर्नामेंट खेलने का मौका मिला और सैनिक स्कूल में पढ़ाई के दौरान हमने भी कई टूर्नामेंट खेला। पिताश्री मेरे मेंटर या गुरु की भूमिका में रहे, फुटबॉल की बारीकियां ओर टिप्स हमें उन्होंने ने ही सिखाई। रोज़ सुबह आर्मी के जवानों संग 5 बजे से 7बजे कई कई किलोमीटर की दौड़ और उनके साथ बीरपुर, 116 ब्रिगेड ग्राउंड , घंघोड़ा ग्राउंड, 58 जीटीसी, महेंद्र ग्राउंड में फुटबॉल प्रैक्टिस और मैच बाद में पवेलियन ग्राउंड देहरादून में भी खेलने का मौका मिला हमें भी मिला।

मेरे पिताजी ने भारतीय सेना में रहते हुए 1962 में चीन की लड़ाई, 1965 में पाकिस्तान जंग जिसमें वे वार वाउंडेड हुए फिर 1971 में भी वार वाउंडेड हुए मगर फिर भी पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध लड़ा जिसमें खुद गोली लगने से कैजुअल्टी के बावजूद लड़ाई लड़ी ओर उसी दौरान उन्हें प्रमोशन मिला और जे सी ओ बने। युद्ध के दौरान प्लाटून कमांडर रहे और बाद में लगभग 14 दिसंबर 1971 को एक अधिकारी मेजर सुर्वे जो अब ब्रिगेडियर रैंक से सेवामुक्त होकर पूना रहते हैं को बॉम्ब ब्लास्ट में पेट भटने से लहूलुहान होने पर उन्हें बचाकर ले जाते हुए अगले दिन सुबह 4बजे पाकिस्तानी सेना ने घेर लिया फिर पाकिस्तान के हत्थे चढ़ गए।

पाकिस्तान के 50km अंदर से भी अधिक भारतीय सेना फाजिल्का सेक्टर की तरफ से घुस चुकी थी, पिताजी को लाहौर जेल में एक साल तक कैद रखा गया। पाकिस्तानी सेना के टॉर्चर और इंटेरोगेशन को सहकार भी अपने सेना के गौरव और देश का मान बढ़ाते हुए खुफिया जानकारी पर जुबान नहीं खोली।
कई कैदियों को जेल में रहते हुए भी लापता दर्शाया गया। 1972 में इंदिरा गांधी के पाकिस्तान जेल में जाने व कैदियों को न मिलने देने पर कैदियों द्वारा उसी दौरान हंगामा करने के बाद उनके साथ कई भारतीय सेना के बंदियों का नाम लिस्ट में जोड़ा गया तब एक साल बाद 01 दिसंबर 1972 में अटारी बॉर्डर अमृतसर लाया गया। फिर मिलिट्री हॉस्पिटल दिल्ली में एक महीने तक स्वास्थ कारणों से रखा गया, उसके बाद घर लौटे।

जेल के अंदर की कहानी और टॉर्चर की दास्तां बड़ी लंबी है। मेरे पिताश्री सिर्फ इंडियन आर्मी के वार हीरो ही नहीं थे बल्कि मेरे भी हीरो/ नायक रहे। उत्तराखंड के गिने चुने लोग ही पाकिस्तान युद्ध बंदी (प्रिजनर ऑफ वार) रहे। हालांकि वे 1983 में वरिष्ठ जूनियर कमीशन्ड ऑफिसर रहे और सूबेदार के रैंक से वालयंट्री रिटायरमेंट लेकर, लगभग दस वर्षों तक कैनरा बैंक में सेवारत रहे। कारगिल युद्ध के दौरान भी उनको भारतीय सेना के युद्ध में लड़ने का जज्बा और प्रयास साफ झलकता था जो उन्होंने सब एरिया हेडक्वार्टर के वेटेरियन मिट के दौरान भी कहा। वो कांग्रेस पार्टी से जुड़े इंदिरा गांधी के प्रभाव से बाद में कल्याण सिंह जी के संपर्क में आने के बाद और अटल बिहारी वाजपेयी की सादगी से प्रभावित होकर भाजपा से जुड़े और कैंट भाजपा में कोषाध्यक्ष भी रहे।

लेकिन बेहद दुखद है कि सरकार कांग्रेस की रही हो या भाजपा की, किसी भी सरकार ने कारगिल युद्ध के सिपाहियों की तरह, 1971 में पाक युद्ध के गिने चुने प्रिजनर ऑफ वार रहे उत्तराखंड के सैनिकों का अन्य राज्यों की भांति सम्मान नहीं किया। खैर ये विवेक तो सरकार का है कि पूर्व सैनिकों और उनके योगदान का सम्मान करना है या नहीं।

केनरा बैंक से रिटायरमेंट के बाद भी पिताश्री कई संस्थाओं से जुड़े रहे और साथ ही अंतिम समय तक टपकेश्वर मंदिर, सीताराम मंदिर, लक्ष्मी नारायण मंदिर, दुर्गा मंदिर, साई मंदिर और क्लिक माता मंदिर मच्छी बाजार देहरादून से जुड़े रहे। ऋषिकेश में गोपाल कुटीर, हनुमान मंदिर, पुष्कर मंदिर और त्रिवेणी घाट, व जन्माष्टमी में हमेशा भजन गाने ओर सुनने हमेशा जाते रहे। सभी प्रमुख स्नानों में हर की पेड़ी या त्रिवेणी घाट निरंतर सपत्नीक जाते रहे। 2015 में एक संस्था द्वारा उन्हें “उत्तराखंड रत्न – वार हीरो” से सम्मानित किया गया। जीवन एक संघर्ष है जिसे हमने उनमें देखा और उनके बताये रास्ते पर चलने का प्रयास करते रहे।

पिताश्री के फर्श से अर्श तक का नशामुक्त सफर संघर्ष, मेहनत, ईमानदारी, जुनून व रोमांच से ओत प्रोत रहा।
उनकी जिंदगी किसी तीन घंटे के फिल्म की कहानी से कहीं अधिक बड़ी रही।

बचपन में पिताश्री की बहुत दहसत होती थी कड़क आवाज रौबदार मूंछे, सरकारी बंगले में 3कमरे का सेट, पिताजी इस कमरे तो हम दूसरे वो दूसरे में आते थे तो हम तीसरे में या बरामद में या बगीचे में। सुबह ठीक पौने चार बजे उठा कर तीनों भाइयों को जमीन में कंबल बिछाकर पढ़ने के लिए फिर सुनना, जबरजस्त खौफ पैदा करता रहा। इंटर करने के बाद भी उनकी दहशत बरकरार थी। धीरे धीरे कॉलेज में आने के बाद और इंडस्ट्रियल इलेक्ट्रॉनिक में डिप्लोमा फिर काम करते करते दहशत सलाह मशवुरा और कई काम में साथ आते जाते दहशत की दोस्त की तरह बन गई। लेकिन कभी सम्मान कम नहीं हुआ, और उनके कई अनुभवों व संबंधों से सीखने का लाभ व पहचान मिली।

कई मुद्दों पर हमारी खूब बहस, तर्क कुतर्क भी होती रही, अगले दिन एक दूसरे से नाराजगी फिर रूठना मनाना भी चलता रहा। पूरे परिवार के साथ ही पूरे मोहल्ले, गांव को एक माला में पिरोने वाले शख्सियत आज भी कई लोगों के दिलों में राज़ करते हैं। ऐसे प्रेरणादायक व्यक्तित्व के धनी पूज्य पिताजी के चरणों में सादर प्रणाम।
श्रीमन नारायण की आप पर हमेशा कृपा बनी रहे और आपका आशीर्वाद सदैव हमें मिलता रहे।
कोटि कोटि नमन🙏🙏🙏

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