आस्था की यात्रा वर्ष में एकबार तो हो ही जाती है इसी कड़ी में इस बार नया अनुभव प्राप्त करने की इच्छा हुई। बहुत नाम सुना था धर्म नगरी वृंदावन का, कई वर्षों से सुनता था, ओर जाना भी चाहता था अपने मित्रों ओर रिश्तेदारों को जाते देखा ओर काफी सुना था मथुरा वृंदावन के बारे में, मगर पहली बार जाकर अफसोस हुआ बांकेबिहारी मंदिर व वृंदावन जा कर। पहले तो सनातनी केंद्र ओर राज्य सरकार की दिखावटी स्वच्छता अभियान के बावजूद गंदगी और मंदिर में अव्यवस्था कहे या कुव्यवस्था कहे, आमजन के सुरक्षा व तीर्थाटन व्यवस्था नगण्य थी। सिर्फ प्रेम मंदिर, चार धाम, इस्कॉन ओर थोड़ी बहुत व्यवस्था, प्रेमानंद जी के केली आश्रम ओर गौरी गोपाल आश्रम में दिखाई वरना गलियां हो या मुख्य मार्ग सब जाम ओर अव्यस्थित ही दिखा। इससे पहले कि बांकेबिहारी मंदिर के कड़वे अनुभव प्रस्तुत करें, आपको बता दे कि….
अबतक नॉर्थ ईस्ट बेल्ट को अगर छोड़ दे तो भारत के कुछ ईस्ट कुछ वेस्ट, कुछ साउथ ओर नॉर्थ के कई धार्मिक स्थलों ओर मंदिरों में तीर्थाटन का अवसर मिला। चेन्नई के पल्लावरम में रहते हुए, मदुरई, मीनाक्षी टेंपल, पद्मनाभन मंदिर, कांचीपुरम, रामेश्वरम, तिरुपति आदि मंदिरों के साथ ही कलकत्ता में रहते दक्षिणेश्वर, ताड़केश्वर, गंगा सागर, जगन्नाथ पुरी, कोणार्क मंदिर, फिर गुजरात के सोमनाथ मंदिर, द्वारकाधीश, राजस्थान के श्रीनाथ जी, दिलवाड़ा मंदिर, ब्रह्मकुमारी, मुंबई में रहते हुए त्रयमेश्वर मंदिर, ओर नासिक के सभी मंदिर, महाबलेश्वर, घृष्णेश्वर मंदिर, सिद्धि विनायक, महालक्ष्मी, हाजी अली, शिरडी साई मंदिर, शनि सिगनापुर, लेटे हुए मारुति मंदिर, बनारस के आसपास काशी विश्वनाथ, बौद्ध गया, प्रयागराज में तो 2007 का कुंभ मेला लाइव टेलीकास्ट का अवसर भी मिला, वही दिल्ली के बंगला साहब गुरुद्वारे का 6माह तक रोजाना लाइव टेलीकास्ट, रघुनाथ मंदिर, वैष्णो देवी सहित नौ देवियां ओर उत्तराखंड के चारों धाम यमनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ सहित उत्तरकाशी, कुंजापुरी, सुरकंडा माता, बूढ़ा केदार आदि, टिहरी, धारी देवी, ज्वालपा देवी, सिद्धबली, पौड़ी, अल्मोड़ा के कई मंदिर, बागेश्वर, हरिद्वार, ऋषिकेश, देहरादून, चंपावत, ब्रह्मदेव मंदिर (नेपाल), नैनीताल और कई अन्य उत्तराखंड के मंदिरों में सभी देवी देवताओं का दर्शन करने का मौका मिला।
लेकिन जो दुर्गति दिल्ली के सनातनी केंद्र सरकार साथ ही उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के सनातनी सरकारों के बावजूद श्रद्धालुओं के लिए मंदिर परिसर में शून्य व्यवस्था नजर आई। इन सरकारों को महाराष्ट्र और साउथ के मंदिरों की दर्शन कराने चाहिए विशेषकर शिरडी साई मंदिर, ताकि करोड़ों की दान प्राप्त कर, डकारने वाले मंदिर समिति, पंडे, बाबा ओर सनातनी व हिन्दू राष्ट्र बनाने का डंका पीटने वाली सरकार, श्रद्धालुओं के सुरक्षा व मंदिरों में आराम से दर्शन की व्यवस्था में चंदे/ दान की निश्चित कुछ प्रतिशत राशि खर्च करे।
बड़े दुख की बात है कि लोग जिस मंदिर के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का तांता वृंदावन में लगता है उस बांके बिहारी मंदिर को पंडे अपना निजी मंदिर और कॉपीराइट बताते हैं। बांके बिहारी अब पण्डो के पूर्वज हरिदास जी का पर्सनल मंदिर है बाकायदा बोर्ड लगा कर बैठे धूर्त लोग।
हमे लगता की सभी सनातनी श्रद्धालुओं को किसी के भी निजी मंदिरों नहीं जाना चाहिए, इस बात की धमकी वहां के लगभग 60करोड़ वार्षिक दान प्राप्त करने वाले हरिदास जी के वारिस/ वंशज पंडे और लगभग 350करोड़ मंदिर में दान की जमापूंजी होने का दावा करते हैं जैसा की मंदिर के आस पास के दुकानदारों और वृंदावन के लोगों ने बताया।
बांके बिहारी जी के दर्शन के लिए जो प्रसाद अंदर चढ़ता ही नहीं, उसे श्रद्धालुओं को जबरन थोपने की कोशिश, तंग और छोटी गालियां अपनी जगह है पर नालायक पण्डो की व्यवस्था शून्य है, कई बच्चों ओर बुजुर्ग महिलाओं को मंदिर के अंदर धक्का मुक्की, भीड़ में पिचकते देखा, सांस अटकते देखा तो बहुत दुख हुआ और रहा नहीं गया, सो मजबूरन ये लेख लिखना पड़ रहा है।
हिंदू पण्डो की कॉपीराइट वाली मानसिकता ओर मंदबुद्धिता पर स्वयं बांके बिहारी जी भी हंसते होंगे और दुखी भी जरूर होंगे। जो अल्प बुद्धि के पंडे मंदिर कॉरिडोर बनाने पर वहां से बांके बिहारी की मूर्ति लेकर ही कही चले जाने, क्योंकि यह उनका निजी कॉपीराइट मंदिर, सो सरकार इसमें हस्तक्षेप न करे जैसी धमकी देते हैं। धर्म के नाम पर दूर दूर से आए श्रद्धालुओं के दान से पलने वाले ऐसे निर्मुखों को कम से कम मंदिर के अंदर पंक्तिबद्ध तरीके सुचारू दर्शनों की व्यवस्था तो जरूर करनी चाहिए।
भक्तों पर अन्याय होता देख, कुव्यवस्थाओं से एकदिन प्रभु श्री राधाकृष्ण जी स्वयं वहां से चले जाएंगे जैसे उन्होंने पूर्व में वृंदावन छोड़ा था, अब श्रद्धालुओं को डिसाइड करना चाहिए कि किसी के निजी मंदिर में दबकर मरने जाना चाहिए या नहीं, क्योंकि प्रभु तो सबमें है। मुझमें राम तुझमें राम सबमें राम समाया, करले सबसे प्यार जगत में कोई नहीं पराया।
मथुरा वृंदावन के कई मंदिरों में पर्दे के पीछे का खेल भी बदस्तूर जारी है। पर्दा हटा जलवा दिखाने के बाद फिर पर्दा लगाने के बाद अंदर पण्डो का खेला चालू रहता है, पैसे लेकर पर्दे के राधा कृष्ण जी के मंदिरों का दर्शन होता रहता है कभी भोग के नाम पर्दा बंद हो तो भी पैसा फेंक कर, एक एक कर मंदिर के अंदर ही कान्हा जी ओर राधा रानी के VIP दर्शन कर लो और प्रसाद लो, बाकी आम जनता घंटों इंतजार करती रहे चिल्लाती रहे तरसती रहे, इन पण्डो के कानो में जूं तक नहीं रेंगती।
कई जगह तो पूरे पण्डो के ही गांव में लगभग 500 घर ओर पण्डो का परिवार, वही जबरन गाइड बनकर मंदिर में दर्शनों के लिए कहानी बताकर दान के लिए उकसाते रहते हैं। अजब गजब देखने को मिला पहली बार मथुरा वृंदावन में।
दर्शनों के लिए इस्कॉन मंदिर, चार धाम (दो घंटे से कम चाहिए) ओर प्रेम मंदिर (शाम 5/6बजे बाद बेहतर समय है घूमने का, रंगजी मंदिर, बिरला मंदिर, चौरासी खंभे, निधिवन, बरसाना, नंदगांव, श्री कृष्ण जन्मभूमि, बंद महल गोकुल, दाऊजी मंदिर, द्वारकाधीश मंदिर आदि कई घाट भी जा सकते हैं। सभी दर्शनों के लिए एक से दो दिन पर्याप्त हैं। रुकने के लिए प्रेम मंदिर, इस्कॉन मंदिर या पापड़ी चौराहा के आसपास प्रचुर मात्रा में गेस्ट हाउस, होटल व धर्मशाला आदि उत्तम हे जो सेंटर प्लेस, यह से आप कही भी जा सकते सब नजदीक है ।
प्रेमानंद जी महाराज के दर्शनों के लिए एक से दो दिन पहले समय बुक करना पड़ता है केवल 120 श्रद्वालु ही रोजाना राधा कैली आश्रम में दर्शन कर पाते हैं। गौरी गोपाल आश्रम सहित कई अन्य कथावाचक भी परिक्रमा मार्ग पर अपने अपने आश्रमों में पैड रहने की व्यवस्था देते हैं।
होली, जन्माष्टमी, छुट्टी वाले दिन, शनिवार, इतवार ओर 15 दिसंबर से प्रथम सप्ताह जनवरी तक भारी भीड़ रहती है। रिक्शे बुक करें या शेयरिंग में जाएं बस भी ससमय चलती रहते है। बस स्टैंड लगभग 4km है रेलवे स्टेशन 5km है।
बुजुर्ग, महिलाएं, बीमार लोग व बच्चे हिम्मत हो भीड़ में पिचकने की तो ही जाए बांके बिहारी जी और निधिवन।
गजबे हिंदुराष्ट्र के नाम पर शासन करने वाली सरकारें, 2014 के बाद, 11सालो से भी अधिक समय हो गया पर हिंदुओं ओर श्रद्धालुओं के लिए कुछ नहीं, बस खुद vip दर्शन किए और राजनैतिक रोटियां सेकी, जनभावनाओं को भड़काकर, कथावाचकों की तर्ज पर राजनेता भी इससे ज्यादा राष्ट्र हिन्दू नहीं बना पाए।
सरकार को भारत की तमाम मंदिरों में शिरडी साई संस्थान की तरह व्यवस्था करनी चाहिए, सभी उत्तराखंड से लेकर तमाम पर्वतीय राज्य के केदारनाथ,बद्रीनाथ, गंगोत्री, यमनोत्री से लेकर जगन्नाथ पूरी, तिरुपति बालाजी, रामेश्वरम, कन्याकुमारी ओर सभी 12ज्योतिर्लिंग में सरकारों को आराम से दर्शनों की व्यवस्था करनी चाहिए।
सभी धार्मिक स्थल चाहे वो किसी भी धर्म के हों, भक्ति स्थल के अंदर सबमें प्रेम और श्रद्धापूर्वक, कतारबद्ध तरीके से आराम से दर्शन करवाने की व्यवस्था की जानी चाहिए। मगर अफसोस चुनाव में इन्हीं धार्मिक स्थलों के नाम से जनभावनाओं को भड़काकर, राजनैतिक रोटी सेंकने तक ही सीमित है हमारे नेता, फिर चाहे किसी धार्मिक आयोजन, कुंभ में भगदड़ से श्रद्धालुओं की मौत ही क्यों न होती रहे। सरकार न भी देखे, नेता कुछ न भी करे पर आमजन को तो कुछ न अपनी व अपने परिजनों की सुरक्षा के लिए कुछ न कुछ अवश्य ही करना चाहिए।






